
नवग्रह: नौ ग्रह, उनका स्वरुप एवं स्वभाव
8 सितंबर 2026
ज्योतिष में जन्म कुंडली को नौ ग्रहों से पढ़ा जाता है; हर ग्रह क्या दर्शाता है, आओ देखते हैं:- सूर्य: पूर्व दिशा के स्वामी, पुरुष, रक्तवर्ण, पित्तप्रकृति और क्रूर ग्रह है। सूर्य आत्मा, स्वभाव, आरोग्यता, राज्य, देवालय का सूचक तथा पितृकारक है। पिता के संबंध में इससे विचार किया जाता है| नेत्र, कलेजा, मेरुदण्ड और स्नायु पर इनका विशेष प्रभाव होता है। यह लग्न से सप्तम स्थान में बली और मकर से छह राशि पर्यन्त चेष्टाबली माने गए हैं, जिनसे शारीरिक रोग, सिरदर्द, अपचन, क्षय, महाज्वर और अतिसार का विचार किया जाता है। चन्द्रमा: पश्चिमोत्तर दिशा का स्वामी, स्त्री, श्वेतवर्ण और जलग्रह है। वातश्लेष्मा इसकी धातु और यह रक्त का स्वामी है। माता-पिता, चित्तवृत्ति, शारीरिक पुष्टि, राजानुग्रह, सम्पत्ति और चतुर्थ स्थान का कारक है। चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा बली और मकर से छह राशि में इसका चेष्टाबल होता है। इससे शारीरिक रोग, पाण्डुरोग, जलज तथा कफज रोग, मूत्रकृच्छ्र, स्त्रीजन्य रोग, मानसिक रोग, व्यर्थ भ्रमण, उदर एवं मस्तिष्क का विचार किया जाता है। कृष्णपक्ष की षष्ठी से शुक्लपक्ष की दशमी तक क्षीण चन्द्रमा रहने के कारण पाप ग्रह और शुक्लपक्ष की दशमी से कृष्णपक्ष की पंचमी तक पूर्ण ज्योति रहने से शुभ ग्रह और बली माना जाता है। बली चन्द्रमा ही चतुर्थ भाव में अपना पूर्ण फल देता है। मंगल: दक्षिण दिशा का स्वामी, पुरुष जाति, पित्त प्रकृति, रक्तवर्ण और अग्नि तत्त्व है। यह स्वभावतः पाप ग्रह है, धैर्य तथा पराक्रम का स्वामी है। तीसरे और छठे स्थान में बली और द्वितीय स्थान में निष्फल होता है। दशम स्थान में दिग्बली और चन्द्रमा के साथ रहने से चेष्टाबली होता है। यह भ्रातृ और भगिनी कारक है। बुध: उत्तर दिशा का स्वामी, नपुंसक, त्रिदोष प्रकृति, श्यामवर्ण और पृथ्वी तत्त्व है। यह पाप ग्रहों- सूर्य, मंगल, राहु, केतु, शनि के साथ रहने से अशुभ और शुभ ग्रहों-पूर्ण चन्द्रमा, गुरु, शुक्र के साथ रहने से शुभ फलदायक होता है। यह ज्योतिष विद्या, चिकित्सा शास्त्र, शिल्प, कानून, वाणिज्य तथा चतुर्थ तथा दशम स्थान का कारक है। चतुर्थ स्थान में रहने से निष्फल होता है, इससे जिह्वा और तालु आदि उच्चारण के अवयवों का विचार किया जाता है। इससे वाणी, गुह्यरोग, संग्रहणी, बुद्धिभ्रम, मूक, आलस्य, वातरोग एवं श्वेतकुष्ठ आदि का विचार विशेष रूप से होता है। गुरु: पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी, पुरुष जाति, पीतवर्ण और आकाश तत्त्व है। यह लग्न में बली और चन्द्रमा के साथ रहने से चेष्टाबली होता है। यह चर्बी और कफ धातु की वृद्धि करने वाला है। इससे पुत्र, पौत्र, विद्या, गृह, गुल्म एवं सूजन (शोथ) आदि रोगों का विचार किया जाता है। शुक्र: दक्षिण-पूर्व का स्वामी, स्त्रीजाति, श्याम-गौर वर्ण एवं कार्य-कुशल है। इस ग्रह के प्रभाव से जातक का रंग गेहुँआ होता है। छठे स्थान में यह निष्फल एवं सातवें में अनिष्टकर होता है। यह जलग्रह है, इसलिए कफ, वीर्य आदि धातुओं का कारक माना गया है। मदेनेच्छा, गानविद्या, काव्य, पुष्प, आभरण, नेत्र, वाहन, शय्या, स्त्री, कविता आदि का कारक है। दिन में जन्म होने पर इससे माता का विचार किया जाता है। सांसारिक सुख का विचार इसी ग्रह से होता है। शनि: पश्चिम दिशा का स्वामी, नपुंसक, वात-श्लेष्मिक प्रकृति, कृष्णवर्ण और वायुतत्त्व है। यह सप्तम स्थान में बली और वक्रीग्रह या चन्द्रमा के साथ रहने से चेष्टा बली होता है। इससे अँगरेजी विद्या का विचार किया जाता है। रात में जन्म होने पर मातृ और पितृ कारक होता है। इससे आयु, शारीरिक बल, उदारता, विपत्ति, योगाभ्यास, प्रभुता, ऐश्वर्य, मोक्ष, ख्याति, नौकरी एवं मूर्च्छादि रोगों का विचार किया जाता है। राहु: दक्षिण दिशा का स्वामी, कृष्णवर्ण और क्रूर ग्रह है। जिस स्थान पर यह रहता है, यह उस स्थान की उन्नति को रोकता है। केतु: कृष्णवर्ण और क्रूर ग्रह है। इससे चर्मरोग, मातामह, हाथ-पाँव और क्षुधाजनित कष्ट आदि का विचार किया जाता है। विशेष - यद्यपि बृहस्पति और शुक्र दोनों शुभ ग्रह हैं, पर शुक्र से सांसारिक और व्यावहारिक सुखों का तथा बृहस्पति से पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुखों का विचार किया जाता है। शुक्र के प्रभाव से मनुष्य स्वार्थी और बृहस्पति के प्रभाव से परमार्थी होता है। शनि और मंगल ये दोनों भी पाप ग्रह हैं, पर दोनों में अन्तर यही है कि शनि यद्यपि क्रूर ग्रह है, लेकिन उसका अन्तिम परिणाम सुखद होता है; यह दुर्भाग्य और मन्त्रणा के फेर में डालकर मनुष्य को शुद्ध बना देता है। परन्तु मंगल उत्तेजना देने वाला, उमंग और तृष्णा से परिपूर्ण कर देने के कारण सर्वदा दुखदायक होता है। ग्रहों में सूर्य और चन्द्रमा राजा, बुध युवराज, मंगल सेनापति, शुक्र-गुरु मन्त्री एवं शनि भृत्य हैं। सबल ग्रह जातक को अपने समान बनाता है। सूर्य कठोर अनुशासन, अहंकार, अधिकार और अनुशासन का प्रतीक है। यह किसी को छूट नहीं देता, इसलिए लोग इसके सख्त स्वभाव को गलत समझ लेते हैं। ✨हर ग्रह कुछ कहता है जिसे आपकी आत्मा ने चुना है — यह जानिए कि आपकी कुंडली में कौन सा ग्रह सबसे मजबूत है, जिससे आपको पता चलेगा कि आपका जीवन आपको कहाँ और कैसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है।