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स्वर विज्ञान: श्वास की जागरूकता का मानव शरीर के स्वास्थ से सम्बन्ध

15 सितंबर 2026

स्वर विचार - जिसे स्वर योग भी कहा जाता है, श्वास के निरीक्षण पर आधारित एक पारंपरिक भारतीय साधना है। ‘स्वर’ का अर्थ श्वास के सूक्ष्म प्रवाह से है। मनुष्य एक ही स्वर में साँस लेता व छोड़ता है। इनका क्रम घंटे-घंटे पर बदलता रहता है। दाहिने स्वर को सूर्य और बांये स्वर को चन्द्र कहते हैं। जब दोनों स्वर एक साथ चलें तो इसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं। कृष्ण पक्ष की प्रथम तीन तिथियों को दाहिना स्वर सूर्योदय के समय होना चाहिये। 3-3 तिथियों में 1-1 स्वर बदलने का प्रमाण है। जैसे कृष्ण पक्ष में एकम से तीज तक सूर्योदय के समय दाहिना स्वर रहेगा, तो चौथ से छठ तक सूर्योदय के समय बांया स्वर फिर साते से नवमी तक दाहिना स्वर रहेगा, दशमी से बारस तक बायां स्वर रहेगा, तेरस से अमावस तक दाहिना स्वर रहेगा। यही क्रम बराबर चलता रहता है। इसमें उदया तिथि मानी जाती है। तिथि घटने पर दो दिन में और बढ़ने पर चार दिन में बदलता है। आपकी सुविधा के लिए जिस दिन बांया स्वर रहेगा, उन तारीखों के साथ 🌙 का चिन्ह एवं जिस दिन दायां स्वर रहेगा उस तारीख में ☀️ का चिन्ह, भविष्य में लगा दिया जायेगा। पारंपरिक मान्यताओं में इन स्वरों के संतुलन को स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। स्वर की गड़बड़ी रहने पर ठीक करें। विपरीत स्वर मिले तो मलमल के धुले हुए कपड़े की गोली बनाकर उस स्वर को बंद कर दें। इस क्रिया को 24 घंटे तक जारी रखें, यदि दूसरे दिन भी ठीक न चले तो क्रमशः 48 या 72 घंटे तक स्वर बंद रखें। गोली दो–दो घंटे में बदलते रहें। इन दिनों अधिक परिश्रम, नशा करने और दौड़ने से बचना चाहिये। किसी भी अभ्यास से असुविधा, चक्कर या घबराहट हो तो उसे तुरंत रोक दें। बांई करवट सोइये, जल बांये स्वर पीव। दाहिने स्वर भोजन करें, तो सुख पावे जीव ॥1॥ दिन में चाले चन्द्रमा रात चलावें सूर। तो निश्चय कर मानिये प्राण गमन अति दूर ॥2॥ 1. प्रात: स्वर चलने वाली करवट से उठना चाहिए। 2. दाहिने स्वर में - शौच, स्नान, भोजन, मंत्र, आराधना, पत्र लिखना, विद्या अध्ययन, स्त्री प्रसंग, युद्ध में जाना, पूर्व और उत्तर दिशा की यात्रा, सवारी खरीदना, दवाई खाना आदि कार्य कीजिये। 3. बायें स्वर में - स्थिर कार्य, विवाह, गुरु मंत्र, योगाभ्यास, खेती, दिव्य औषधि बनाना, बाग, सरोवर बनवाना, प्रीति, दक्षिण और पश्चिम दिशा में यात्रा, दूध, चाय, दवा, पानी आदि पेय पदार्थ लेंवे। 4. सुषुम्ना स्वर - यह स्वर स्वरों के बदलने के संधि काल तथा अन्त समय निकट होने, कोई विशिष्ट दुर्घटना या बुरा फल सम्भावित होने पर ही चलता है। ऐसे समय में केवल ईश्वर भजन करें। 5. यात्रा विचार - पूर्व, उत्तर, ईशान और अग्निकोण की ओर दाहिने स्वर में। दक्षिण, पश्चिम, नैऋत्य और वायव्य कोण की ओर बायें स्वर में जाना चाहिये। 6. शरीर में किसी समय कोई कष्ट होने पर चलने वाले स्वर को बन्द कर दूसरा स्वर चलाने से कष्ट दूर होता है। 7. जो दिन में चन्द्र और रात में सूर्य स्वर चलाता है, वह दीर्घायु तथा विष टोना आदि के प्रभाव से मुक्त रहता है। 8. चैत्र शुक्ल 1 को सूर्योदय के समय स्वर का ध्यान रखें। स्वर गड़बड़ रहने से पूरा साल खराब जाने की संभावना रहती है। ✨ पारंपरिक मान्यताओं में इन स्वरों के संतुलन को स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। स्वर विज्ञान जागरूकता के एक छोटे से अभ्यास से शुरू होता है: स्वाभाविक रूप से श्वास लें, स्पष्टता से देखें और इस क्षण में थोड़ा अधिक संतुलन आने दें।